Connect with us

अनपढ़ किसान का छोटा बबुआ बन गया कलेक्टर,जो कभी दो वक्त की रोटियों के लिए भी तरसता था

farmer-his-son-most-popular-dm-of-up

सफलता की कहानी

अनपढ़ किसान का छोटा बबुआ बन गया कलेक्टर,जो कभी दो वक्त की रोटियों के लिए भी तरसता था

किसी ने सच ही कहा है काबिल बनो, कामयाबी झक मारकर आपके पास आएगी. फिल्म का यह डॉयलाग कानपुर के कलेक्टर/जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह पर सटीक बेठता है. एक समय था , जब उन्हे कच्चे घर में दो वक्त की रोटी के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती थी.अनपढ़ माता-पिता जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी को धका रहे थे, लेकिन जिंदगी की मुश्किलों ने उन्हे समझा दिया था कि बच्चों को तो काबिल बनाना है.

स्कूल के आंगन में जिसने कभी पैर भी नहीं रखा था, वह तमाम मुश्किलों से लड़ता-जूझता अपने लाडले को पढ़ाता रहा. उनके छोटे बेटे का बचपन से ही सपना था की उसे कलेक्टर बनना है, यही ललक ओर अनपढ़ किसान पिता की उम्मीदों पर वह बेटा खरा उतरा ओर आज वह कानपुर का कलेक्टर बन गया .

farmer-his-son-most-popular-dm-of-up

जब सैदपुर गांव में एक गरीब किसान महेंद्र सिंह के परिवार में 1982 में बेटे ने जन्म लिया तो, खुशियों का भंडार उनके घर आ गया था, पिता ने चहकते हुए कहा था की मेरे घर कलेक्टर आया है. पिता की बात सुन कर कुछ लोग हंस पड़े.

farmer-his-son-most-popular-dm-of-up

खुद कभी पढे नहीं थे, लेकिन गांव के प्राइमरी स्कूल में फटा बस्ता लेकर वह अपने दोनों बेटो को स्कूल भेजा करते थे. जीतेंद्र पढ़ाई करने के लिए दिल्ली गए जो मास्टर बन गए. लेकिन सुरेंद्र अपनी मंजिल का रास्ता तराशने में लगे रहे. गांव में आठवीं की पढ़ाई खत्म करने के बाद पढ़ाई का अन्य कोई इंतजाम नहीं था, उस समय भाई के कहने पर वह आगे की पढ़ाई करने के लिए लपककर दिल्ली पहुंच गए, जहा वह इंटरमीडियट की पढ़ाई पूरी की.

farmer-his-son-most-popular-dm-of-up

सुरेंद्र सिंह पढऩे में काफी होशियार था, वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया ओर उसकी काबिलियत निखरती गई. एक दिन गांव की महफिल में प्रधान ने सुरेंद्र से मज़ाक मे पूछ लिया की तुम्हें क्या बनना है ,इत्तेफाक से सुरेन्द्र ने भी वही जवाब दिया जो अनपढ़ किसान ने उनके जन्म पर दिया था.

इंटरमीडियट की पढ़ाई पूरी कर वह जयपुर गए, जहां महाराजा कालेज से बीएससी और एमएससी पास करने के बाद एमएससी में सुरेंद्र ने अपनी काबिलियत का वह डंका बजा दिया था. उन्हें रिकार्ड नंबर के साथ गोल्ड मेडल भी प्राप्त हुआ.

एक-दो नहीं, तीन मर्तबा सुरेंद्र का चयन पीसीएस के लिए हुआ था, लेकिन जिद्दी सुरेंद्र सिंह ने पीसीएस की नौकरी को ज्वाइन नहीं किया, क्यो की उनका सपना तो कुछ ओर ही था.उनकी मेहनत-लगन सफल हुई ओर वर्ष 2005 में सुरेंद्र का यह सपना पूरा हुआ. उन्होने देश में 21वीं रैंक हासिल कर यूपी में अव्वल नंबर पर आए. वह अफेन साथ-साथ अपने साथियों को भी आगे बढऩे में सहता करते रहे.

Continue Reading
Advertisement
You may also like...
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More in सफलता की कहानी




Story of Ashok Singh Tapasvi
success-story-of-ratnesh
success story of sudheesh guruvayoor
First transgender engineer Malini Das Success Story
This Lady Doctor In Varanasi Do Not Charge Fees If Women Gives Birth To Baby Girl
Rajeev Gandhi And Sonia Gandhi Love Story
aese-paise-kamate-hai-aaj-kal-ki-smart-housewife
what-is-your-personality
Story of Raja Dasharatha
Biography of Mother Teresa

To Top